बोध का युद्ध

कुरुक्षेत्र की हवाएँ चौड़े, धूल भरे मैदान पर चल रही थीं, रथों के लाल झंडों को फड़फड़ा रही थीं और तीरों को टूटी हुई यादों की तरह जमीन पर बिखेर रही थीं।

कुरु वंश के महान भीष्म पितामह, तीरों की शय्या पर लेटे हुए थे, उनका कवच आर-पार था, उनकी साँसें तेज़ लेकिन स्थिर थीं। उनकी आँखें, जो कभी अग्नि जैसी तीव्र जुनून और शाही इच्छा से चमकती थीं, अब एक ऐसे व्यक्ति की कठोर खालीपन दिखा रही थीं जिसने साम्राज्यों को बनते-बिगड़ते, अभिमान के लिए रक्त बहते, और स्वार्थ से वफादारियों को टूटते देखा था।


जैसे ही युद्ध रुका, धर्मराज युधिष्ठिर गिरे हुए वृद्ध के पास पहुँचे। हाथ जोड़कर उन्होंने पूछा, "पितामह, यह युद्ध क्यों हुआ? क्या हम सब संबंधी नहीं हैं?"

भीष्म ने आकाश की ओर देखा और फुसफुसाए, "युधिष्ठिर, आज मैं यहाँ दुश्मनों के कारण नहीं, बल्कि उन स्वार्थों के कारण लेटा हूँ जिनकी हम सब ने सेवा की। दुर्योधन सत्ता के लिए लड़ा, तुम धर्म के लिए, और मैं... मैं अपनी प्रतिज्ञा के लिए। हम में से किसी ने भी सचमुच एक-दूसरे के लिए लड़ाई नहीं की।"

एक कौवा पास के एक तीर पर उतरा, मानो खामोशी को विराम दे रहा हो। कृष्ण, दूर से देखते हुए, गहरी सोच में अपनी आँखें बंद कर लीं। अर्जुन, अपने भाई के बगल में खड़ा होकर बोला, "लेकिन हमने दोस्ती पर विश्वास किया। सम्मान पर।"

भीष्म हल्के से मुस्कुराए। "विश्वास समय के साथ बदलता है, मेरे बच्चे। आज के सहयोगी, कल के विरोधी। इरादे पुरुषों को आकार देते हैं। दोस्ती और दुश्मनी दोनों स्वार्थ के आवरण हैं।"

उस रात, योद्धाओं ने लड़ाई नहीं की। वे चुपचाप बैठे रहे, कुछ अपनी कैंपफायर के पास, अन्य अकेले तारों के नीचे, मरते हुए वृद्ध द्वारा कहे गए सत्य पर विचार कर रहे थे। क्योंकि उस युद्ध के मैदान पर, जब इस्पात मांस से टकराया, तो सबसे बड़ा घाव युद्ध का नहीं था—बल्कि बोध का था।

नैतिक शिक्षा:
पुरुषों की दुनिया इरादों से रंगी हुई है। अक्सर, जिसे हम दोस्ती या दुश्मनी कहते हैं, वह व्यक्तिगत स्वार्थ की छाया मात्र होती है।

प्रेरणा:
कोई किसी का मित्र नहीं होता, कोई किसी का शुभचिंतक नहीं होता, लोग केवल स्वार्थ के कारण ही मित्र या शत्रु बनते हैं। - महर्षि व्यास