टूटा घड़ा
पुणे के रजनीश आश्रम में, नीम के पेड़ों से छनकर आती सुबह की धूप के नीचे, एक शिष्य ने एक बार ओशो से पूछा, "गुरुदेव, मैंने ज़ेन, योग, सूफीवाद और क्वांटम भौतिकी पर सैकड़ों किताबें पढ़ी हैं। मुझे लगता है कि मैं आत्मज्ञान के करीब हूँ। क्या मैं तैयार हूँ?"
ओशो धीरे से मुस्कुराए, अपनी बेंत की कुर्सी पर पीछे झुक गए, और शिष्य को बैठने का इशारा किया।
"मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ," उन्होंने कहा।
"एक बार एक आदमी एक कुम्हार के पास आया, एक सुंदर नक्काशीदार मिट्टी का घड़ा लिए हुए। उसने कहा, 'इसे ठीक कर दो।' 'इसमें एक छोटी सी दरार है।' कुम्हार ने उसकी जाँच की और जवाब दिया, 'इसे ठीक करने के लिए, मुझे इसे पूरी तरह से तोड़ना होगा और इसे फिर से ढालना होगा।'
आदमी घबरा गया। 'इसे तोड़ दो? लेकिन यह घड़ा फारस का है! यह कीमती है।'
कुम्हार मुस्कुराया, 'तो अपनी दरार रखो। लेकिन यह फिर कभी पानी नहीं रोक पाएगा।'
तुम देखते हो," ओशो ने अपनी आँखें आधी बंद करते हुए आगे कहा, "तुम उस घड़े की तरह हो—उधार के ज्ञान से सजे हुए। लेकिन टूटे हुए। और जब तक तुम खुद को बिखरने नहीं दोगे—अपने मन को, अपनी पहचान को, अपनी मान्यताओं को—तुम सत्य को धारण करने में अक्षम रहोगे।"
शिष्य अवाक रह गया।
उस दिन बाद में, वही आदमी आँगन में पत्ते झाड़ते हुए देखा गया—आँखें खाली, मुस्कान खिलती हुई—उसकी किताबें कहीं दिखाई नहीं दे रही थीं।
नैतिक शिक्षा:
सच्ची समझ तभी शुरू होती है जब मन अपने ज्ञान के किले को त्याग देता है।
प्रेरणा:
जब तक आपका मन पूरी तरह नष्ट नहीं हो जाता, तब तक आपके लिए कोई आशा नहीं है। - ओशो
